नाग पंचमी की कथा

नाग पंचमी की कथा

सावन माह की शुक्ल पक्ष के पंचमी को नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है.नाग पंचमी के दिन नाग देवता या सर्प की पूजा की जाती हैऔर उन्हें दूध से स्नान कराया जाता है.लेकिन कहीं-कहीं दूध पिलाने की परम्परा चल पड़ी है.क्या आप जानते हैं?नाग को दूध पिलाने से वह दूध का पाचन नहीं कर पाता जिस कारण उनकी मृत्यु हो जाती है.शास्त्रों में भी नागों को दूध पिलाने को नहीं बल्कि दूध से स्नान कराने की बात कही गई है.मान्‍यताओं के अनुसार नाग पंचमी के दिन रुद्राभिषेक करने से कालसर्प दोष से मुक्ति मिल जाती है.
नागपंचमी के ही दिन अनेकों गांव और कस्बों में कुश्ती का आयोजन होता है.इस दिन गाय, बैल आदि पशुओं को नदी, तालाब में ले जाकर नहलाया जाता हैऔर अष्टनागों की पूजा की जाती है.

नागपंचमी के पर्व पर वाराणसी ( काशी) में नाग कुआँ नामक स्थान पर बहुत बड़ा मेला लगता है, ऐसा कहा जाता है कि इस स्थान पर तक्षक नाग गरूड़ जी के भय से बालक रूप में काशी संस्कृत की शिक्षा लेने के लिए आये,परन्तु गरूड़ जी को इसकी जानकारी हो गयी,और उन्होंने तक्षक पर हमला कर दिया, परन्तु अपने गुरू जी के प्रभाव से गरूड़ जी ने तक्षक नाग को अभय दान कर दिया, तभी से यहां पर नाग पंचमी के दिन नागों की पूजा की जाती है और जो भी नाग पंचमी के दिन यहाँ पूजा अर्चना कर नाग कुआँ का दर्शन करता है, उसकी जन्मकुन्डली से सर्प दोष का निवारण हो जाता है.

नाग पंचमी की कथा-

प्राचीन काल की बात है,एक सेठ था. उसके सात पुत्र थे सातों पुत्रों का विवाह हो चुका था .सेठ के सबसे छोटे पुत्र की पत्नी उच्च चरित्र की विदूषी और सुशील महिला थी, परंतु उसके कोई भी भाई नहीं था.
एक दिन सेठ की बड़ी बहू ने घर लीपने के लिए पीली मिट्टी लाने के लिए सभी बहुओं को अपने साथ चलने को कहा,तो सभी सभी बहुएं डलिया और खुरपी लेकर मिट्टी खोदने के लिए चल पड़ी. जब वह मिट्टी खोद रही थी तभी वहां एक सर्प निकला, जिसे बड़ी बहू खुरपी से मारने लगी,यह देखकर छोटी बहू ने उसे रोकते हुए कहा- ‘मत मारो इसे? यह बेचारा निरपराध है.’

छोटी बहू की बात सुनकर बड़ी बहू ने उस सर्प को नहीं मारा और वह सर्प एक और जाकर बैठ गया. छोटी बहू ने उस सर्प से कहा कि “तुम यहां से कहीं मत जाना, हम अभी लौट कर आ रहे हैं.”

यह कहकर छोटी बहू सभी के साथ मिट्टी लेकर घर चली गई और घर के कामकाज में फस कर भूल गई कि उसने सर्प से वादा किया था कि वह लौट कर आएगी.
दूसरे दिन छोटी बहू को जब यह बात याद आई तो वह सबको लेकर उसी स्थान पर पहुंची जहां वह सर्प को छोड़ कर आई थी.
छोटी बहू ने देखा कि सर्प अब भी उसी जगह बैठा हुआ है.यह देखकर छोटी बहू बोली “सर्प भैया प्रणाम.”
सर्प ने छोटी बहू से कहा “तूने मुझे भैया कहां है,इसीलिए तुझे छोड़ देता हूं,नहीं तो झूठी बात कहने के कारण मैं तुझे डस लेता.”
तब छोटी बहू बोली “भैया मुझसे भूल हो गई,मैं आपके पास वापस आने की बात घर के कामकाज के कारण भूल गई,परंतु जब मुझे याद आया तो मैं यहां तुरंत आ गई, आपको परेशानी हुई इसके लिए मैं आपसे क्षमा मांगती हूं.”
तब सर्प बोला “अच्छा आज से तू मेरी बहन हैऔर मैं तेरा भाई, बोल तुझे क्या मांगना है, मांग ले.”
तब छोटी बहू बोली “मेरा कोई भी भाई नहीं है,आप मेरे भाई बन गए मुझे इससे बहुत अच्छा लग रहा है.”
कुछ दिन बीत जाने पर सर्प मनुष्य का रूप धरकर छोटी बहू के घर आया और बोला “कि मेरी बहन यहां रहती है,कृपया करके उसे मेरे साथ भेज दीजिए.”
छोटी बहू के ससुराल वालों ने कहा “हमारी छोटी बहू के तो कोई भाई नहीं है तो तुम कौन हो?”
इस पर सर्प ने जवाब दिया “मैं उसके दूर के रिश्ते का भाई हूं,बचपन में ही बाहर चला गया था.”
तब छोटी बहू के ससुराल वालों ने छोटी बहू को बुलवाया और उसके विश्वास दिलाने पर घर के लोगों ने छोटी बहू को उसके भाई के साथ भेज दिया.मार्ग में सर्प अपनी बहन से बोला कि ‘मैं वहीं सर्प हूँ, इसलिए तू डरना नहीं और जहां चलने में कठिनाई हो वहां मेरी पूछ पकड़ लेना.”
सर्प के कहे अनुसार ही बहन ने किया और इस प्रकार वह सर्प के घर पहुंच गई.वहाँ के धन-ऐश्वर्य को देखकर वह चकित रह गई.
एक दिन सर्प की मां ने सर्प की बहन से कहा”मैं एक काम से बाहर जा रही हूँ, तू अपने भाई को दूध ठंडा करके पिला देना.”
बहन को यह बात ध्यान न रही और उसने अपने भाई को गर्म दूध ही पिला दिया.जिस कारण सर्प का मुंह बुरी तरह से जल गया.यह देखकर सर्प की मां बहुत क्रोधित हुई, परंतु सर्प के समझाने-बुझाने पर वह शांत हो गई.सर्प ने कहा कि बहन को आए हुए बहुत दिन हो गए इसलिए बहिन को अब उसके ससुराल भेज देना चाहिए.तब सर्प और उसके पिता ने उसे बहुत सा सोना, चाँदी, जवाहरात, वस्त्र-भूषण आदि देकर उसके ससुराल पहुँचा दिया.
बड़ी बहू ने जब छोटी बहू के पास इतना सारा धन देखा, तो वह ईष्यावश होकर बोली “तेरा भाई तो बड़ा धनवान है उसके पास तो बहुत सारा धन है,तुझे तो और भी धन लाना चाहिए था.”

सर्प ने जब यह वचन सुना तो सब वस्तुएँ सोने की लाकर दे दीं.यह देखकर बड़ी बहू ने कहा- ‘इन्हें झाड़ने की झाड़ू भी सोने की होनी चाहिए.” तब सर्प ने झाडू भी सोने की लाकर रख दी.
सर्प ने छोटी बहू को हीरा-मणियों का एक अद्भुत और अत्यंत सुंदर हार दिया था.छोटी बहू के उस हार की प्रशंसा उस देश की रानी ने भी सुनी और वह राजा से बोली कि”सेठ की छोटी बहू के पास अत्यंत सुंदर हीरा -मणियों का हार है, उसका हार यहाँ आना चाहिए.”
राजा ने मंत्री को हुक्म दिया कि सेठ के घर से हार लेकर शीघ्र ही दरबार में उपस्थित हो. मंत्री ने सेठजी से जाकर कहा कि “हमारी महारानी ने छोटी बहू का हार मंगवाया है, वह उस हार को पहनेगी,इसलिए आप वह हार मुझे लाकर दे दीजिए.” सेठ ने डर के कारण अपनी छोटी बहू का हार मंत्री को दे दिया.

छोटी बहू को यह बात बहुत बुरी लगी, उसने अपने सर्प भाई को याद कियाऔर सर्प के आने पर उसने कहा”भैया रानी ने मेरा हार छीन कर मंगवा लिया है, कृपया करके तुम कुछ ऐसा करो कि जब रानी वह हार अपने गले में डाले तो वह सर्प बन जाए और वह हार मुझे लौटा दे,तब हार हीरों और मणियों का हो जाए.”
सर्प ने ठीक वैसा ही किया.जैसे ही रानी ने हार पहना, वैसे ही वह सर्प बन गयाऔर रानी डरकर चीखने-चिल्लाने लगी और रोने लगी.
यह देख कर राजा ने तुरंत अपने सैनिकों को सेठ के पास भेजा और कहा कि सेठअपनी छोटी बहू को लेकर तुरंत हाजिर हो. यह सुनकर सेठ डर गया और सोचने लगा ना जाने राजा क्या करेगा और छोटी बहू को लेकर राज दरबार में उपस्थित हो गया.

राजा ने छोटी बहू से पूछा”तुने क्या जादू किया है,कि यह हार रानी के गले में आते ही सर्प बन गया, मैं तुझे दण्ड दूंगा.”
छोटी बहू बोली- राजन ! धृष्टता क्षमा कीजिए, यह हार ही ऐसा है कि मेरे गले में हीरों और मणियों का रहता है और दूसरे के गले में सर्प बन जाता है.”
यह सुनकर राजा ने वह सर्प बना हार छोटी बहू देकर कहा”यह हारअभी पहन कर दिखाओ.”
छोटी बहू ने जैसे ही उस हार को पहना वैसे ही हार हीरों-मणियों का हो गया.
यह देखकर राजा को उसकी बात का विश्वास हो गया और उसने प्रसन्न होकर उसे बहुत सी मुद्राएं पुरस्कार में दीं. छोटी बहू हार और मुद्राएं लेकर घर वापस आ गई. यह सब देख कर बड़ी बहू ने ईर्षा के कारण छोटी बहू के पति से कहा कि तुम्हारी पत्नी के पास कहीं से धन आया है.यह सुनकर उसके पति ने अपनी पत्नी को बुलाकर कहा”सच सच बता कि यह धन तुझे कौन देता है?”
तब छोटी बहू अपने भाईसर्प को याद करने लगी.उसी समय सर्प वहां प्रकट हुआ और अपनी बहन के पति से बोला”जो कोई भी मेरी धर्म बहिन के आचरण पर संदेह प्रकट करेगा तो मैं उसे खा लूँगा.”
यह सुनकर छोटी बहू का पति बहुत प्रसन्न हुआ और उसने सर्प देवता का बड़ा सत्कार किया.उसी दिन से नागपंचमी का त्योहार मनाया जाता हैऔर स्त्रियाँ सर्प को भाई मानकर उसकी पूजा करती हैं.



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