हिंदू पंचांग के अनुसार अशोक अष्टमी व्रत का पालन चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथिको किया जाता है। इस व्रत का उल्लेख कूर्म पुराण तथा कृत्यरत्नावली जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। यह व्रत विशेष रूप से शोक, मानसिक कष्ट और शारीरिक रोगों से मुक्ति के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, इसी शुभ तिथि को भगवान हनुमान ने माता सीता की खोज के दौरान उन्हें अशोक वाटिका में पाया था। माता सीता अशोक वृक्ष के नीचे विराजमान थीं, जहाँ हनुमान जी ने उन्हें भगवान श्रीराम की अंगूठी प्रदान की और उनके संदेश से उन्हें आश्वस्त किया।
इसी कारण यह दिन शोक के नाश और आशा के उदय का प्रतीक माना जाता है।
व्रत परिचय ग्रंथों में इस व्रत को अशोक कालिका प्राशन व्रत भी कहा गया है। इस व्रत में अशोक वृक्ष की कोमल कलिकाओं या पत्तियों का सेवन किया जाता है।
एक अन्य मान्यता के अनुसार, इस दिन अशोक की कलिकाओं का रस पीने से शारीरिक रोग नष्ट होते हैं और व्यक्ति को उत्तम स्वास्थ्य तथा दीर्घायु का वरदान प्राप्त होता है।
इसी कारण अशोक अष्टमी व्रत को स्वास्थ्य, शांति और दीर्घ जीवन प्रदान करने वाला व्रत माना गया है।
कलिकाओं का सेवन करते समय निम्न मंत्र का जाप करना चाहिए—
मंत्र (संस्कृत):
त्वामशोक नमाम्येन मधुमाससमुद्भवम्।
शोकार्तः कलिकां प्राश्य मामशोकं सदा कुरु॥
मंत्र (देवनागरी उच्चारण):
त्वामशोक नमाम्येन मधुमाससमुद्भवम्।
शोकार्तः कलिकां प्राश्य मामशोकं सदा कुरु॥
मंत्र का अर्थ:
“हे वसंत ऋतु में उत्पन्न होने वाले अशोक वृक्ष! मैं आपको नमन करता हूँ।
मैं शोक से पीड़ित होकर आपकी पवित्र कलिकाओं का सेवन करता हूँ।
कृपया मुझे सदा के लिए शोक-रहित कर दें।”
शास्त्रों के अनुसार, विधिपूर्वक इस व्रत को करने से—
यदि अशोक अष्टमी बुधवार को पड़े या पुनर्वसु नक्षत्र से युक्त हो, अथवा दोनों का संयोग हो, तो व्रती जीवन भर शोक से मुक्त रहता है।
अशोक अष्टमी व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि शोक से आशा की ओर ले जाने वाला आध्यात्मिक मार्ग है। व्रत परिचय में वर्णित अनुसार, इस व्रत के पालन से व्यक्ति को पूर्ण शांति, सुख और मानसिक संतुलन की प्राप्ति होती है।
अतः जो व्यक्ति जीवन में मानसिक पीड़ा, दुख या रोगों से मुक्ति चाहता है, उसके लिए अशोक अष्टमी व्रत का पालन अत्यंत कल्याणकारी माना गया है।