गणेश चतुर्थी 2021

गणेश चतुर्थी 2021

महत्वपूर्ण जानकारी

  • दिनांक: शुक्रवार, 10 सितंबर 2021
  • चतुर्थी तिथि शुरू : 12:18 पूर्वाह्न 10 सितंबर, 2021 तक
  • चतुर्थी तिथि समाप्त : 09:57 अपराह्न 10, 2021 तक
  • अवलोकन: प्रार्थना, उत्सव और देवताओं का विसर्जन।
  • छुट्टी का प्रकार: लोक, धार्मिक
  • धर्मों में चित्रित: हिंदू धर्म
  • शुरू होती है: भाद्रपद शुक्ल
  • इन्हें भी कहा जाता है: चवथ, गणेशोत्सव
  • समाप्त: शुरू होने के 11 दिन बाद

गणेश चतुर्थी का त्योहार हिन्दू भगवान गणेश के सम्मान के लिए मनाया जाता है। इस त्योहार को विनायक चतुर्थी के रूप में भी जाना जाता है। यह त्योहार हिन्दूओं का प्रमुख त्योहार है तथा यह त्योहार पूरे भारत में विशेष तौर से दक्षिण भारत में महाराष्ट्र, कर्नाटक और तेलंगाना बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।  अब यह त्योहार विदेशों में भी मनाया जाता है जैसे अमेरिका, कनाडा, माॅरीशस और अन्य स्थानों में जहां भारतीय हिन्दु प्रवास करते है। यह त्योहार हिन्दु कलेंडर के अनुसार भाद्रपद्र में शुरू के शुक्ल चतुर्थी तथा अगस्त और सितंम्बर महीनों के बीच में आता है। यह त्योहार दस दिनों तक तथा अनंत चतुर्थी के अन्त तक मनाया जाता है। इस त्योहार को मराठा राज शिवाजी के काल (1630-1680ई) से सार्वजनिक रूप से मनाया जाने लगा है।

गणेश चतुर्थी त्योहार में दस दिनों तक भगवान गणेश की पूजा की जाती है तथा कई धार्मिक संस्थाओं द्वारा बडें अस्थायी पंडालों का निर्माण कर तथा पंडालों को फूलों और लाइटों से सजाया जाता है तथा उसमें मिट्टी से बनी भगवान श्री गणेश की मूर्ति स्थापित कि जाती है। इस त्योहार में हिन्दु परिवार अपने घरों में भी भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित करते है इन मूर्तिओं को मूर्तिकार द्वारा 2-3 महीनें पहले बनाया जाता हैै और अंत में भगवान गणेश की मूर्ति का नदी में विर्सजन किया जाता है।

गणेश कथा
देवी पार्वती अपने स्नान के लिए इस्तेमाल किया चंदन का पेस्ट भगवान गणेश को बनाया था। देवी पार्वती जब स्नान के लिए गई तो भगवान गणेश को द्वार पर खाडा कर दिया ये आदेश दिया कि कोई भी अन्दर न आ पाये। जब भगवान शिव शंकर द्वार पर आये तो गणेश ने उन्हें प्रवेश नहीं करने दिया। भगवान शिव क्रोधित हो गये। भगवान शंकर ने गणेश को शिष्टाचार सिखाने के लिए अपने गणों को आदेश दिया परन्तु गणेश बहुत शाक्तिशाली था गणेश ने हर किसी को हारा दिया और किसी को भी प्रवेश नहीं करने दिया। अंत में भगवान शिव ने गणेश का सिर काट दिया। जब देवी पार्वती स्नान करके बाहर आयी तो यह देखकर पार्वती बहुत क्रोधित हुई और भगवान शिव से गणेश को जीवत करने को कहा। भगवान शंकर ने अपने गणों को उत्तर दिशा की तरह कटे सिर को खाजने को कहा परन्तु गणेश का सिर नहीं मिल पाया अंत में गणेश के शरीर पर मानव कि जगह एक हाथी का सिर लगा कर भगवान शंकर ने गणेश को जीवत किया।

वक्रतुण्ड महाकाय सुर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।


मतलब:हे टेढ़ी सुंड वाले, हे बडे शरीर वाले, सूर्य की रोशिनी के समान प्रकाशमान श्री गणेश भगवान, हमेशा कि तरह मेरे सभी कामों को बाधाओं से मुक्त कर दें।

सुमुख का अच्छा चेहरा होना
एकदंत एक दांत वाला
कपिला अनन्त
गज करनक होने
लमबोडर बड़ा पेटवाला
विकट विशाल
विघ्ननाशक बाधाओं का नाश करने वाले
गणदीप गणों का नेता
धूमराकेटु grey-bannered
गणधर गणों के प्रमुख
भालचंद्र माथे पर चंद्रमा
गजानन हाथी का चेहरा

पूजा विधान

इस दिन प्रातः काल स्नानादि से निवृत्त होकर सोना, तांबा, चाँदी, मिट्टी या गोबर से गणेश की मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करनी चाहिए। पूजन के समय इक्कीस मोदकों का भोग लगाते हैं तथा हरित दुर्वा के इक्कीस अंकुर लेकर निम्न दस नामों पर चढ़ाने चाहिए -

1. गतापि, 2. गोरी सुमन, 3. अघनाशक, 4. एकदन्त, 5. ईशपुत्र, 6. सर्वसिद्धिप्रद, 7. विनायक, 8. कुमार गुरु, 9. इंभवक्त्राय, 10. मूषक वाहन संत।

तत्पश्चात् इक्कीस लड्डुओं में से दस लड्डू ब्राह्मणों को दान देना चाहिए तथा ग्यारह लड्डू स्वयं खाने चाहिए।

कथा

देवी पार्वती ने गणेश को चंदन के लेप से बनाया जो उन्होंने अपने स्नान के लिए इस्तेमाल किया और मूर्ति में प्राण फूंक दिए। फिर देवी पार्वती ने नहाते समय गणेश को दरवाजे पर पहरा देने के लिए खड़ा कर दिया। जब भगवान शिव बाहर से लौटे और गणेश उन्हें नहीं जानते थे, तो उन्होंने भगवान शिव को प्रवेश नहीं करने दिया। भगवान शिव क्रोधित हो गए और अपने अनुयायी गणों से बच्चे को कुछ शिष्टाचार सिखाने के लिए कहा। गणेश बहुत शक्तिशाली थे, सभी को हरा दिया और किसी को भी अंदर प्रवेश नहीं करने दिया जबकि उनकी माँ नहा रही थी। अंत में क्रोधित भगवान शिव ने बालक गणेश का सिर काट दिया। यह देखकर देवी पार्वती क्रोधित हो गईं और तब भगवान शिव ने उन्हें वचन दिया कि वह बच्चा फिर से जीवित हो जाएगा। गणों ने उत्तर दिशा में व्यक्ति के सिर की तलाश की, लेकिन वे नहीं मिले और मानव और इसके बजाय एक हाथी का सिर लाया। भगवान शिव ने इसे बच्चे के शरीर पर तय किया और उसे वापस जीवन में लाया।





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