पशुपतिनाथ मंदिर, काठमांडू, नेपाल

पशुपतिनाथ मंदिर, काठमांडू, नेपाल

महत्वपूर्ण जानकारी

  • पता: देवपाटन गांव, काठमांडू 44600, नेपाल।
  • गर्मियों में खुले और बंद समय: सुबह - सुबह 04:30 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक। शाम - शाम 4:30 बजे से शाम 08:00 बजे तक
  • सर्दियों में खुले और बंद समय: सुबह - 05:30 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक। शाम - शाम 4:30 बजे से शाम 06:30 बजे तक
  • क्या आप जानते हैं: केवल हिंदू धर्म के अनुयायियों को ही पशुपतिनाथ मंदिर में प्रवेश की अनुमति है। गैर-हिंदू आगंतुकों को मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है।

पशुपतिनाथ मंदिर एक हिन्दू मंदिर है जो नेपाल के मुख्य व प्रसिद्ध राज्य काठमांडू में स्थित है। काठमांडू नेपाल की राज्यधानी है और पशुपतिनाथ मंदिर काठमांडू से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित देवपाटन गांव में स्थित है। पशुपतिनाथ मंदिर के पास नदी है जिसका नाम बागमती नदी है। पशुपतिनाथ मंदिर पूर्णतयः भगवान शिव का समर्पित है। नेपाल के धर्म निरपेक्ष राष्ट्र बनने से पहले भगवान शिव नेपाल के राष्ट्र देवता मनाने जाते थे।

विश्व धरोहर

पशुपतिनाथ मंदिर केवल नेपाल की धरोहर नहीं है अपितु यह मंदिर यूनेस्को विश्व सांस्कृतिक विरासत स्थल में भी सूचीबद्ध किया है। ऐसा माना जाता है कि पशुपतिनाथ मंदिर हिन्दू धर्म के सबसे प्राचीन मंदिरों में एक है। इसलिए पशुपतिनाथ मंदिर नेपाल का सबसे पवित्र मंदिर माना जाता हैं।

गैर हिन्दू का प्रवेश

पशुपतिनाथ मंदिर में केवल हिन्दू धर्म के अनुयायियों को ही प्रवेश करने के अनुमति होती है। गैर हिंदू आगंतुकों को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं होती है वे केवल बाहर से, बागमती नदी के दूसरे किनारे से मंदिर को देख सकते हंै। यह मंदिर नेपाल में शिव का सबसे पवित्र मंदिर माना जाता है। 15 वीं शताब्दी के राजा प्रताप मल्ल द्वारा शुरु कि गई परंपरा के अनुसार मंदिर में चार पुजारी (भट्ट) और एक मुख्य पुजारी (मूल-भट्ट) भगवान पशुपतिनाथ की सेवा करता है ये पुजारी दक्षिण भारत के ब्राह्मणों में से रखे जाते हैं। केवल भारत से आये सिखों और जैनियों को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी जाती है।

पशुपतिनाथ मंदिर की वस्तुकला

पशुपतिनाथ मंदिर निर्माण, नेपाल की शिवालय शैली में बनाया गया है। मंदिर की दो-स्तर की छतें हैं जो मुख्य से तांबे से बनी है और सोना द्वारा उसका आवरण किया हैं। मंदिर आधार से शिखर तक 23 मीटर 7 सेमी की ऊंचाई के साथ एक वर्गाकार आधार मंच पर टिकी हुई है। इसके चार मुख्य दरवाजे हैं, जो सभी चांदी की चादरों से ढके हुए हैं। इस मंदिर में एक स्वर्ण शिखर है। अंदर दो गर्भगृह हैंः आंतरिक गर्भगृह या गर्भगृह वह है जहां शिवलिंग स्थिापित है, और बाहरी गर्भगृह एक खुला गलियारा जैसा स्थान है।

पशुपतिनाथ मंदिर का निर्माण

नेपाल की किंवदंतियों के अनुसार, पशुपतिनाथ मंदिर का निर्माण तीसरी सदी ईसा पूर्व में सोमदेव राजवंश के पशुप्रेक्ष द्वारा किया गया था किंतु उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेज के अनुसार इस मंदिर का निर्माण 13वीं शताब्दी में हुआ था। मूल मंदिर कई बार नष्ट हुआ। इसे वर्तमान स्वरूप नरेश भूपतेंद्र मल्ल ने 1697 में प्रदान किया था।

भगवान शिव का अभिषेक

पशुपतिनाथ मंदिर के आंतरिक गर्भगृह जहां लिंगम स्थिापित है, उसके चार प्रवेश द्वार हैं- पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण। सुबह 9ः30 बजे से दोपहर 1ः30 बजे तक। भक्त चारों दरवाजों से पूजा कर सकते हैं।

अभिषेक के दौरान सुबह 9 से 11 बजे तक चारों दरवाजे भी खोल दिए जाते हैं, मुख की दिशा के आधार पर अभिषेक किया जाता है।

त्योहार

हिन्दू धर्म में साल भर में कई त्यौहार होते हैं, जैसे महाशिव रात्रि, बाला चतुर्थी त्यौहार और तीज त्यौहार। तीज पशुपतिनाथ मंदिर में सबसे अधिक मनाया जाने वाला त्योहार है। पशुपतिनाथ में शिवरात्रि का पर्व विशेष महत्व के साथ मनाया जाता है।

पशुपतिनाथ से जुड़ी किंवदंती

नेपाल महात्म्य और हिमवतखंड पर आधारित स्थानीय किंवदंती के अनुसार भगवान शिव एक बार वाराणसी के अन्य देवताओं को छोड़कर बागमती नदी के किनारे स्थित मृगस्थली चले गए, जो बागमती नदी के दूसरे किनारे पर स्थित जंगल में है। भगवान शिव वहां पर चिंकारे का रूप धारण कर निद्रा में चले गए। जब देवताओं ने उन्हें खोजा और उन्हें वाराणसी वापस लाने का प्रयास किया तो उन्होंने नदी के दूसरे किनारे पर छलांग लगा दी। इस दौरान उनका सींग चार टुकडों में टूट गया। इसके बाद भगवान पशुपति चतुर्मुख लिंग के रूप में प्रकट हुए।

एक कथा के अनुसार, महाभारत के युद्ध के बाद पांडवो अपने पाप से मुक्ति के लिए भगवान शंकर का आर्शीवाद चाहते थे। पांडवो भगवान शंकर को खोजते हुए भारत के राज्य उत्तराखण्ड में स्थित केदारनाथ पहुँच गए जहां भगवान शंकर ने बैल का रूप धारण कर रखा था। पांडवो ने भगवान शंकर को खोज कर उनसे आर्शीवाद प्राप्त किया था। ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतर्ध्यान हुए, तो उनके धड़ से ऊपर का भाग काठमाण्डू में प्रकट हुआ। जहां अब पशुपतिनाथ का प्रसिद्ध मंदिर है। भगवान शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मदमदेश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए। इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदार कहा जाता है। भारत में पंचकेदार की यात्रा प्रसिद्ध है।









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