कनक दुर्गा मंदिर

कनक दुर्गा मंदिर

महत्वपूर्ण जानकारी

  • स्थान: अर्जुन स्ट्रीट मल्लिकार्जुनपते इंद्रकीलाद्री, विजयवाड़ा, आंध्र प्रदेश 520001।
  • ओपन और क्लोज टाइमिंग: सुबह 06:00 बजे से 11:30 बजे, दोपहर 12:30 से शाम 05:45 और शाम 06:30 से 08:00 बजे।।
  • मुकामंदपम दर्शन पर प्रति व्यक्ति 100 / - रू। बंगारू वैकिली दर्शनम को प्रति व्यक्ति 300 / - रू। अधिक जानकारी के लिए क्लिक करें
  • निकटतम रेलवे स्टेशन: कनक दुर्गा मंदिर से लगभग 3.3 किलोमीटर की दूरी पर विजयवाड़ा जंक्शन रेलवे स्टेशन।
  • निकटतम हवाई अड्डा: कनक दुर्गा मंदिर से लगभग 24.7 किलोमीटर की दूरी पर विजयवाड़ा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा।
  • क्या आप जानते हैं: कनक दुर्गा को 'देवी शाकंभरी' के रूप में भी माना जाता है।

कनक दुर्गा मंदिर एक हिन्दू मंदिर है जो कि भारत के राज्य आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में स्थित है। यह मंदिर आंध्र प्रदेश के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। यह मंदिर पूर्णतयः माता दूर्गा को समर्पित है। मंदिर कृष्णा नदी के किनारे, इंद्रकीलाद्री पहाड़ी पर स्थित है। देवी कनक दुर्गा के बारे में कालिका पुराण, दुर्गा सप्तशती और अन्य वैदिक साहित्य में उल्लेख किया गया है। कनक देवी को स्वायंभु बताया गया है।

कनक दुर्गा को ‘देवी शाकम्भरी’ का रूप भी माना जाता है यहाँ शाकम्भरी उत्सव मनाया जाता है देश मे माँ शाकम्भरी का मुख्य मंदिर उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के निकट शिवालिक पर्वत श्रृंखला मे है शाकम्भरी देवी ही कनक दुर्गा के नाम से विजयवाड़ा मे विख्यात है।

मंदिर में माता कनक दुर्गा की 4 फुट उंची और शानदार व खूबसूरत गहनों से सुसज्जित मूर्ति स्थापित है। जिसमें माता के आठ सशस्त्र रूप को दर्शाया गया है तथा महिषासुर वध को दर्शाया गया है।

कनक माता की कथा

मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा है- जब जब पृथ्वी पर राक्षसों ने तबाही मचाई है। तब तब राक्षसों को मारने के लिए माता पार्वती जी ने अलग अलग रूप धारण कियें। उन्होंने शुंभ और निशुंभ को मारने के लिए कौशिकी, महिषासुर के वध के लिए महिषासुरमर्दिनी व दुर्गमसुर के लिए दुर्गा जैसे रूप धारण कियें थे। कनक दुर्गा ने अपने श्रद्धालु कीलाणु को पर्वत बनकर स्थापित होने का आदेश दिया, ताकि वह वहाँ वास कर सकें। महिषासुर का वध करते हुए इंद्रकिलाद्रि पर्वत पर माँ आठ हाथों में अस्त्रयुक्त हो शेर पर सवार हैं। पास की ही एक चट्टान पर ज्योतिर्लिंग के रूप में शिव भी स्थापित हैं। ब्रह्मा ने यहाँ शिव की मलेलु (बेला) के पुष्पों से आराधना की थी, इसलिए यहाँ स्थापित शिव का एक नाम मलेश्वर स्वामी पड़ गया।

ऐसा माना जाता है कि यहाँ पर इंद्र देव भी भ्रमण करने आते हैं, इसलिए इस पर्वत का नाम इंद्रकिलाद्रि पड़ गया। सनातन धर्म में किसी भी देवी को देवता के बाई ओर स्थापित किया जाता है परन्तु यहां पर मलेश्वर देव की दाईं ओर माता स्थापित है।

एक और पौराणिक कथा यह है कि अर्जुन ने युद्ध में जीतने के लिए इंद्रकीला पहाड़ी की चोटी पर भगवान शिव से प्रार्थना की और आशीर्वाद प्राप्त किया। इस विजय के बाद शहर का नाम ‘विजयवाड़ा’ पड़ा।

वार्षिक त्योहार

दशहरा के दौरान विशेष पूजा की जाती है जिसे नवरात्रि भी कहा जाता है। सबसे महत्वपूर्ण सरस्वती पूजा और थेप्पोत्सवम हैं।
देवी ‘दुर्गा’ के लिए दशहरा का त्यौहार हर साल यहाँ मनाया जाता है। बड़ी संख्या में तीर्थयात्री रंगारंग समारोहों में भाग लेते हैं और कृष्णा नदी में एक पवित्र स्नान करते हैं।

शाकंभरी त्योहार

वार्षिक देवी शाकंभरी त्योहार आषाढ़ माह में विशेष पवित्रता और समारोहों के साथ मनाया जाता है। तीन दिन तक चलने वाली उत्सव देवी के दौरान, कनक दुर्गा बानाशंकरी अम्मा मंदिर के शाकंभरी या बाणासकरी अम्मा का रूप धारण करती हैं, जिसमें देवी से सभी सब्जियों, कृषि और भोजन को आशीर्वाद देने के लिए प्रार्थना की जाती है ताकि समाज के सभी वर्गो को भरपूर पोषण मिल सकें। यह हर साल आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष त्रयोदशी से पूर्णिमा तक मनाया जाता है। देवी शाकंभरी मंदिर, उत्तर प्रदेश में सहारनपुर उत्तर के पास शिवालिक पर्वत श्रृंखला में स्थित है।



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