धारी देवी मंदिर

Dhari Devi Temple

Short information

  • Location : Dang Chaura, Uttarakhand 246174,
  • Open : All Days
  • Timings: 6.00 am to 7.00 pm (best to visit during the morning and evening aarti)
  • Nearest Railway Station : Rishikesh Railway Station Distance of 122 km
  • By Road : Delhi to Rishikesh distance approx 253 km, Rishikesh to Sri Nagar distance approx. 106 km, approx 20 km from Rudraprayag and approx 15.5 km from Sri Nagar.

धारी देवी मंदिर, देवी काली माता को समर्पित एक हिंदू मंदिर है। धारी देवी को उत्तराखंड की संरक्षक व पालक देवी के रूप में माना जाता है। यह मंदिर उत्तराखंड राज्य के गढ़वाल क्षेत्र में अलकनंदा नदी के तट पर श्रीनगर-बद्रीनाथ राजमार्ग पर कल्यासौर में स्थित है।

यह श्रीनगर, उत्तराखंड से लगभग 15 किमी, रुद्रप्रयाग से 20 किमी और दिल्ली से 360 किमी दूर है।

धारी देवी की मूर्ति का ऊपरी आधा भाग आलक्कन नदी में बहकर यहां आया था तब से मूर्ति यही पर है। तब से यहां देवी धारी के रूप में मूर्ति पूजा की जाती है। माना जाता है कि धारी देवी दिन के दौरान अपना रूप बदलती है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, कभी एक लड़की, एक औरत, और फिर एक बूढ़ी औरत का रूप बदलती है। मूर्ति की निचला आधा हिस्सा कालीमठ में स्थित है, जहां माता काली के रूप में आराधना की जाती है।

कालीमठ भारत में 108 शक्तिस्थलों में से एक है। धार्मिक परंपरा के अनुसार कालीमठ एक ऐसी जगह है जहां देवी काली ने रक्तबीज राक्षस को मार डाला था और उसके बाद देवी पृथ्वी के नीचे चली गई थी।

मंदिर में भक्त बड़ी संख्या में पूरे वर्ष मां के दर्शन के लिए आते करते हैं। धारी देवी मंदिर में मनाए जाने वाले कई त्योहार है उनमें से, दुर्गा पूजा व नवरात्री में विशेष पूजा मंदिर में आयोजित की जाती है, ये त्योहार यहां का महत्वपूर्ण त्योहार हैं। मंदिर सुंदर फूलों और लाईटों से सजाया जाता है

किंवदंती 2013 उत्तराखंड बाढ़
देवी काली की अभिव्यक्ति, धारी देवी को चार धामों के रक्षक के रूप में सम्मानित किया गया है। जब धारी देवी की मूर्ति उसके स्थान से हटा दिया गया था तो कुछ घंटों के बाद ही बहुत बढ़ा बादल फाटा। भक्तों के अनुसार, इस जगह को देवी की क्रोध का सामना करना पड़ा, क्योंकि उन्हें 330 मेगावाट की जल विद्युत परियोजना के लिए रास्ता बनाने के लिए अपने मूल स्थान से स्थानांतरित किया गया था। यह परियोजना बाढ़ के बाद खंडहर बन गई थी। एक स्थानीय राजा द्वारा 1882 में इसी तरह की कोशिश थी तब भी केदारनाथ में भूस्खलन हुआ था।

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