हरे कृष्ण, हरे राम मंत्र का अर्थ

हरे कृष्ण, हरे राम मंत्र का अर्थ

महत्वपूर्ण जानकारी

  • Did you know: This mantra is the mantra of Lord Vishnu and Shri Krishna.

यह मंत्र भगवान विष्णु का महा मंत्र है यह मंत्र भगवान विष्णु के संस्कृत के सर्वोच्चतम तीन नामों से बना है हरे, कृष्ण और राम। इस मंत्र के कई व्याख्याएं है जिनमें से सभी को सही रूप माना जा सकता है। इस मंत्र में ‘हरे’ हो श्री हरि के मुख्य रूप में व्याख्या किया जा सकता है। हरि नाम भगवान विष्णु का एक नाम है  जिसका अर्थ है ‘वह जो भ्रम को हट देता है’। एक और व्याख्या जो हरे नाम को मुखिया के रूप में है, ‘राधा का नाम’ जो कि भगवान कृष्ण की आंतरिक शक्ति के रूप में माना जाता है, इसमें ‘भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की ऊर्जा/शक्ति’ को संदर्भित करती है। जबकि ‘कृष्ण’ और ‘राम’ नाम भगवान सर्वोच्च देवता का संदर्भ देते है, जिसका अर्थ है ‘वह जो सभी को आकर्षित करता’ और ‘वह जो सभी प्रार्णियों का खुशी का स्त्रोत है’।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे।।

ऐसा माना जाता है कि कलियुग में इस मंत्र का जाप के अलावा जीव के उद्धार का अन्य कोई भी उपाय नहीं है। इस मंत्र का विवरण कई हिन्दू गं्रथों में बृहन्नार्दीय पुराण, पद्म पुराण, श्रीमद् भागवत, श्री रामरक्षास्त्रोत्रम्, ब्रह्माण्ड पुराण, भक्तिचंद्रिका, अथवेद, यजुर्वेद, विष्णुधर्मोत्तर और हरिवंशपुराण किया गया है।

हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलं।
कलौ नास्त्यैव नास्त्यैव नास्त्यैव गतिरन्यथा।। - बृहन्नार्दीय पुराण

कलियु में केवल हरिनाम के जाप से ही उद्धारा हो सकता है इसके अलावा कलियुग में उद्धार का अन्य कोई भी उपाय नहीं है! नहीं है! नहीं है!

श्रीमद्भागवत (12.3.51) का कथन है- यद्यपि कलियुग दोषों का भंडार है तथापि इसमें एक बहुत बडा सद्गुण यह है कि सतयुग में भगवान के ध्यान (तप) द्वारा, त्रेतायुगमें यज्ञ-अनुष्ठान के द्वारा, द्वापरयुगमें पूजा-अर्चना से जो फल मिलता था, कलियुग में वह पुण्यफलश्रीहरिके नाम-संकीर्तन मात्र से ही प्राप्त हो जाता है।
द्वापर युग के अंत में जब देवर्षि नारद ने ब्रह्माजी से कलियुग में कलि के प्रभाव से मुक्त होने का उपाय पूछा, तब सृष्टिकर्ता ने कहा- आदिपुरुष भगवान नारायण के नामोच्चारण से मनुष्य कलियुग के दोषों को नष्ट कर सकता है। नारदजी के द्वारा उस नाम-मंत्र को पूछने पर हिरण्यगर्भ ब्रह्माजी ने बताया-

इति षोडषकं नाम्नाम् कलि कल्मष नाशनं।
नातरू परतरोपायरू सर्व वेदेषु दृश्यते।।

अर्थात रू सोलह नामों वाले महामंत्र का कीर्तन ही कलियुग में कल्मष का नाश करने में सक्ष्म है। इस मन्त्र को छोड़ कर कलियुग में उद्धार का अन्य कोई भी उपाय चारों वेदों में कहीं भी नहीं है।

वेद , रामायण, महाभारत और पुराणों में आदि, मध्य और अंत में सर्वत्र श्रीहरिका ही गुण- गान किया गया है।




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