अमला नवमी, अक्षय नवमी

अमला नवमी, अक्षय नवमी

महत्वपूर्ण जानकारी

  • आंवला नवमी, अक्षय नवमी
  • शुक्रवार, 12 नवंबर 2021
  • नवमी तिथि शुरू: 12 नवंबर, 2021 को 05:51
  • नवमी तिथि समाप्त: 13 नवंबर, 2021 को 05:31 बजे

कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को ‘आँवला नवमी’ कहते है। जैसे नाम से पता चलता है कि इस दिन आँवला वृक्ष की पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि अच्छा स्वस्थ की इच्छा पूर्ति के लिए आँवला वृक्ष की पूजा की जाती है। आँवला वृक्ष की पूजा करने से आयु और  आरोग्य में वृद्धि होती है। आयुवेद में आँवला के कई गुणों के बारे में बताया गया है। जो अच्छे स्वस्थ के लिए जरूरी है।

इस दिन को अक्षय नवमी भी कहा जाता है। इसे अक्षय नवमी भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन किया गया कोई भी शुभ कार्य अक्षय फल देने वाला होता है। अर्थात् उसके शुभ फल में कभी कमी नहीं आती।

पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने वंृदावन-गोकुल की गलियों को छोड़कर मथुरा प्रस्थान किया था। यह वह दिन था जब भगवान श्रीकृष्ण ने लीलाओं को त्याग कर कत्र्तव्य के पथ पर कदम रखा था।

कैसे करें आँवला नवमी की पूजा

प्रातः स्नान करके शुद्ध आत्मा से आँवले के वृक्ष के नीचे पूर्व दिशा में बैठकर पूजन करना चाहिए। पूजन के बाद उसकी जड़ में जल या कच्चा दूध देना चाहिए। इसके बाद वृक्ष के चारों ओर कच्चा धागा बाँधना चाहिए। कपूर बाती या शुद्ध घी की बाती से आरती करते हुए सात बार परिक्रमा करनी चाहिए। इसके बाद पेड़ के नीचे ब्राह्मण को भोजन कराकर दान दक्षिणा देनी चाहिए।

आँवला नवमी कथा

काशी नगरी में एक निःसन्तान धर्मात्मा तथा दानी व्यापारी रहता था। एक दिन व्यापारी की पत्नी से एक पड़ोसन बोली यदि तुम किसी पराये लड़के की बलि भैरव के नाम से चढ़ा दो तो तुम्हें पुत्र प्राप्त हो सकता है।

यह बात जब व्यापारी को पता चली तो उसने अस्वीकार कर दिया। परन्तु उसकी पत्नी मौके की तलाश में लगी रही।

एक दिन एक कन्या को उसने कुएँ में गिराकर भैरों देवता के नाम पर बलि दे दी। इस हत्या का परिणाम विपरीत हुआ। लाभ की जगह उसके बदन में कोढ़ हो गया। लड़की की प्रेतात्मा उसे सताने लगी।

व्यापारी के पूछने पर उसकी पत्नी ने सारी बात बता दी। इस पर व्यापारी कहने लगा गौवध, ब्राह्मणवध तथा बालवध करने वाले के लिए इस संसार में कहीं जगह नहीं है। इसलिए तू गंगातट पर जाकर भगवान का भजन कर तथा गंगा में स्नान कर तभी तू इस कष्ट से छुटकारा पा सकती है।

व्यापारी की पत्नी गंगा किनारे रहने लगी। कुछ दिन बाद गंगा माता वृद्धा का  वेष धारण कर उसके पास आयी और बोली तू मथुरा जाकर कार्तिक मास की नवमी का व्रत तथा आँवला वृक्ष की परिक्रमा कर तथा उसका पूजन कर। यह व्रत करने से तेरा यह कोढ़ दूर हो जायेगा।

वृद्धा की बात मानकर वह, व्यापारी से आज्ञा लेकर मथुरा जाकर विधिपूर्वक आँवला का व्रत करने लगी। ऐसा करने से वह भगवान की कृपा से दिव्य शरीर वाली हो गई तथा उसे पुत्र की प्राप्ति भी हुई।

आँवला नवमी दूसरी कथा

एक सेठ आंवला नवमी के दिन आंवले के पेड़ के नीचे ब्राह्मणों को भोजन कराया करता था और उन्हें सोने का दान दिया करता था। उसके पुत्रों को यह सब देखकर अच्छा नहीं लगता था और वे पिता से लड़ते-झगड़ते थे। घर की रोज-रोज की कलह से तंग आकर सेठ घर छोड़कर दूसरे गांव में रहने चला गया। उसने वहां जीवनयापन के लिए एक दुकान लगा ली। उसने दुकान के आगे आंवले का एक पेड़ लगाया। उसकी दुकान खूब चलने लगी। वह यहां भी आंवला नवमी का व्रत-पूजा करने लगा तथा ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देने लगा। उधर, उसके पुत्रों की व्यापार ठप हो गया। उनकी समझ में यह बात आ गई कि हम पिताश्री के भाग्य से ही खाते थे। बेटे अपने पिता के पास गए और अपनी गलती की माफी मांगने लगे। पिता की आज्ञानुसार वे भी आंवला के पेड़ की पूजा और दान करने लगे। इसके प्रभाव से उनके घर में भी पहले जैसी खुशहाली आ गई।





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