मां डाट काली मंदिर - देहरादून, उत्तराखंड

मां डाट काली मंदिर - देहरादून, उत्तराखंड

महत्वपूर्ण जानकारी

  • पता: NH 72A, अशक्रोडी, उत्तराखंड 247662
  • खुलने का समय: 5:00 पूर्वाह्न - 9:00 अपराह्न
  • निकटतम रेलवे स्टेशन: दाता काली मंदिर से लगभग 12.5 किलोमीटर की दूरी पर देहरादून रेलवे स्टेशन।
  • निकटतम हवाई अड्डा: देहरादून का जॉली ग्रांट हवाई अड्डा दात काली मंदिर से लगभग 38.5 किलोमीटर की दूरी पर है।
  • निकटतम बस स्टैंड: देहरादून का आईएसबीटी दात काली मंदिर से लगभग 8.7 किलोमीटर की दूरी पर है
  • मुख्य त्योहार: नवरात्रि।
  • प्राथमिक देवता: देवी काली।
  • फोटोग्राफी: अनुमति नहीं है।

मां डाट काली मंदिर हिन्दूओं को एक प्रसिद्ध मंदिर है जो कि सहानपुर देहरादून हाईवे रोड़ पर स्थिति है। यह मंदिर मां काली को पूर्णतः समर्पित है जोकि भगवान शिव की पत्नी देवी सती का अंश माना जाता है। मां डाट काली मंदिर को मनोकामना सिद्धपीठ व काली मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि माता डाट काली मंदिर सिद्धपीठों में से एक है।

मां डाट काली मंदिर देहरादून के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है तथा देहरादून शहर से 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थिति है।  मां डाट काली मंदिर का निर्माण 13 जून 1804 ई. में किया गया था जब वहां देहरादून-सहानपुर राजमार्ग का निर्माण कार्य किया जा रहा था। ऐसा माना जाता है कि मां काली अभियंता के सपने में आयी थी, जिन्होने मंदिर की स्थापना के लिए महंत सुखबीर गुसैन को देवी काली की प्रतिमा दी थी। जो आज भी घाटी के मंदिर में स्थिपित है। इसे ‘दात काली मंदिर‘ कहा जाता है।

मां डाट काली मंदिर के विशेषता यहां कि यहा एक दिव्य ज्योति जल रही है जोकि 1921 से लगातार जल रही है। यहां के आस पास के लोग जब भी कोई नया वाहन खरीदते है इस मंदिर में पूजा के लिए मां डाट काली मंदिर में आते है। यहा मंदिर देहरादून-सहानपुर रोड़ के किनारे पर स्थित है इसलिए जो भी व्यक्ति यहां से जाता है मां काली का आर्शीवाद जरूर लेता है और मंदिर में तेल, घी, आटा व अन्य वस्तु चढाता है। इस मंदिर में एक बडा हाॅल भी है जहां पर लोग आराम भी कर सकते है।

इस मंदिर में भक्त दर्शनो के लिए आते रहते है परन्तु नवरात्री के त्योहार के अवसर पर यहां बहुत बड़ी संख्या में लोग आते है, कभी कभी तो राजमार्ग को भी बन्द करना पडता है। नवरात्री के त्योहार के अवसर पर यहा भंडारा भी किया जाता है जहां लोग इसे मां काली का आर्शीवाद मानकर ग्रहण करते है।




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