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कामाख्या मंदिर

कामाख्या मंदिर, कामाख्या देवी के लिए सपमर्पित एक हिन्दू मंदिर है। जो असम की राजधानी दिसपुर पास स्थित है यह गुवाहाटी शहर से 8 किलोमीटर दूर कामाख्या तथा कामाख्या से भी 10 किलोमीटर दूर नीलाचल पर्वत पर स्थित है। यह मंदिर शक्ति की देवी सती का मंदिर है। कामाख्या मंदिर मां सती के 51 शक्तिपीठों में एक है। यह माता सती के योनि के रूप की पूजा होती है। कामाख्या मंदिर में साल में एक बार जून के महीने में मंदिर तीन दिनों के लिए बन्द रहता है। ऐसा माना जाता है कि देवी इस दौरान अपनी मासिक चक्र मे होती है खून का प्रवाह होता है जिससे ब्रह्मपुत्र नदी का पानी लाल हो जाता है।

कामाख्या मंदिर दस महाविद्या ( हिंदू धर्म में आदि शक्ति के दस रूपों का एक समूह है) को समर्पित परिसर में मुख्य मंदिर हैः काली, तारा, सोडाशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नामस्ता, धुमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला, इनमें से त्रिपुरासुंदर, मातंगी और कमला मुख्य मंदिर के अंदर विरामान हैं जबकि बाकी सात अन्य मंदिरों में विरामान हैं। यह हिंदुओं के सभी संप्रदायों और विशेषकर तांत्रिक उपासकों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। लेकिन, यह विदेशी पर्यटकों के लिए भी एक प्रमुख पर्यटन स्थल है।

विश्व के सभी तांत्रिकों, मांत्रिकों एवं सिद्ध-पुरुषों के लिये वर्ष में एक बार पड़ने वाला अम्बूवाची योग पर्व वस्तुत एक वरदान है। यह अम्बूवाची, भगवती (सती) का रजस्वला पर्व होता है। जो प्रत्येक वर्ष जून माह में तिथि के अनुसार मनाया जाता है।

माना जाता है कि कामख्या मंदिर 16 वीं शताब्दी की शुरुआत में नष्ट हो गया था और बाद में 17 वीं सदी में कूच बिहार के राजा नारा नारायण द्वारा पुनर्निर्माण किया गया था।

कामाख्या मंदिर से जुड़ी बहुत पौराणिक कथाये हैं परन्तु एक कथा जो इस मंदिर लिए महत्वपूर्ण है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा दक्ष प्रजापति भगवान ब्रह्मा जी के पुत्र थे और सती के पिता थे। सती भगवान शिव की प्रथम पत्नी थी। राजा दक्ष ने एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया जिसमें सभी देवी-देवताओं, ऋषियों और संतो को आमंत्रित किया। इस यज्ञ में भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया था। इस घटना से सती ने अपमानित महसूस किया क्योंकि सती को लगा राजा दक्ष ने भगवान शिव का अपमान किया है। सती ने यज्ञ की अग्नि में कूद कर अपने प्राण त्याग दिये थे। तब भगवान शंकर देवी सती के मृत शरीर को लेकर पूरे ब्रह्माण चक्कर लगा रहे थे इसी दौरान भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 51 भागों में विभाजित कर दिया था। सती के शरीर के अंग अलग-अलग जगहों पर गिर गए, जिन्हें शक्ति पीठ के नाम से जाना जाने लगा। प्रसिद्ध कामख्या मंदिर में, देवी की गर्भ और योनि की पूजा की जाती है।

ऐसा कहा जाता है कि प्यार की देवता, कामदेव को शाप के कारण, अपने पौरुष का नुकसान उठाना पड़ा था। कामदेव ने शक्ति के गर्भ और जननांगों की खोज की जिससे उन्हें शाप से मुक्त मिली थी। कामेदव ने यहां अपनी शक्ति प्राप्त की और ‘कामख्या देवी’ की मूर्ति स्थापित की और पूजा की।

कालिक पुराण के अनुसार कामख्या मंदिर वह जगह है जहां देवी सती का भगवान शिव के साथ मिलन हुआ था। संस्कृत में इस मिलन का अर्थ ‘काम’ है, और इसलिए, इस स्थान को कामख्या कहा जाता है।

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मानचित्र में कामाख्या मंदिर

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